Thursday, March 23, 2017

Shaheed Diwas

शहीद दिवस का जिक्र जब भी होता हैं तो हमारे ध्यान मे आता है कि इसी दिन २३ मार्च १९३१ को हमारी मातृभूमि के तीन सपूतों ने हँसते-हँसते इस पुण्यभूमि के लिए अपने प्राणों को होम किया था। इन वीर सपूतों से तो आप भलीभाँति परिचित होंगे ही ।
जी हाँ भगत सिंह, सुखदेव, व राजगुरु। 



   कितने आश्चर्य की बात है न कि हमारी आयु वर्ग के ही तीनों युवक कैसे इस पुनीत किन्तु कठिन  कार्य को अंजाम देने के लिए तैयार हो गये। यहा पुनीत किन्तु कठिन कार्य से तात्पर्य मातृभूमि के लिए अपने सर्वस्व अर्पण कर देना फिर वह तन, मन, धन या तीनों हो सकता है।
 तीनों युवक सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से थे। 
   भगत सिंह जी का जन्म २८ सितम्बर १९०७ को बंगा ग्राम जारनवाला तहसील पंजाब प्रांत(वर्तमान में पाकिस्तान) मे हुआ था।
उनके पिताजी सरदार किशन सिंह जी समाजसेवी थे। उनके दोनो चाचा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के कारण भगत सिंह जी के जन्म के समय जेल में बंद थे। उनके बचपन कि बात है जब वे अपने पिताजी के साथ एक दिन खेत गये थे, भगत सिंहजी वहाँ गड्ढा खोद रहे थे तब सरदार किशन सिंहजी ने कहा कि बेटा क्या कर रहे हैं तो भगत सिंहजी ने कहा कि मैं बंदूक बो रहा हूँ जब ये बंदूक लग जायेंगे तो मैं इनसे अंग्रेजों को अपने देश से भगाऊँगा ! इतनी कम उम्र मे ऐसी महान सोच तो कोई भविष्य का विरला ही सोच सकता है। महज १२ वर्ष की आयु मे ईसवी सन् १९१९ मे जलियावालाँ बाग हत्या कांड के बाद वे उस मिट्टी को हाथ मे लेकर प्रण करते हैं कि जब तक प्राण है तब अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध लड़ते रहेंगे। जिस उम्र मे बच्चे खिलौनों के लिए ज़िद करते हैं उस उम्र में भगत सिंह महात्मा गाँधीजी के असहयोग आंदोलन मे हिस्सा लेते हैं किन्तु यह मार्ग उनको दुश्वारा गुजरता है और वे नेशनल कॉलेज मे दाखिला लेकर राष्ट्र रक्षणार्थ क्रान्ति के मार्ग पर चलने लगते है जहां वे भिन्न-भिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियो के सम्पर्क मे आते है, और एक दिन श्री लाला लाजपत राय जी के नेतृत्व में साइमन कमीशन की रिपोर्ट के विरोध में प्रदर्शन मे हिस्सा लेते है, इसे रोकने हेतू अंग्रेज पुलिस लाठिचार्ज करती है जिसमें रायजी बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं और उनकी मृत्यु हो जाती है, जिसका बदला लेने के लिए भगत सिंह उस अंग्रेज पुलिस कि हत्या की  कोशिश करते है किन्तु वे इस कार्य मे असफल हो जाते है। फिर एक दिन वे असेम्बली के अंदर बम विस्फोट करके भारतमाता कि जय, वन्दे मातरम् व इन्कलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए स्वयं को पुलिस के हवाले कर देते है लेकिन यह बम विस्फोट किसी को हताहत करने के लिए नही किया जाता है ।
 सुखदेवजी का जन्म ईसवी सन् १५ मई १९०७ को पंजाब प्रांत (वर्तमान में पाकिस्तान) मे हुआ था। सुखदेवजी जब बहुत छोटे होते है उनके पिताजी श्री रामलालजी कि मृत्यु हो जाती है।
  पंजाब व उत्तर भारत के क्रांतिकारीयो मे सुखदेव बहुत बड़ी शख्सीयत के रुप मे प्रतिष्ठित थे। उन्हें जे. पी. सांडर्स कि हत्या व असेम्बली मे बम फेंकने के कारण गिरफ्तार कर लिया जाता है।
 राजगुरुजी का जन्म  ईसवी सन् २४ अगस्त १९०८ को पुणे, महाराष्ट्र मे हुआ था इन्हें भी जे. पी. सांडर्स कि हत्या व असेम्बली मे बम फेंकने के कारण गिरफ्तार कर लिया जाता है।
इस प्रकार तीनों क्रान्तिकारियो को क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण  ईसवी सन् ३१ मार्च १९३१ फांसी दे दी गई।
   मातृभूमि के इन तीनों सुपूतो के इस महान त्याग के पीछे एक लक्ष्य, कर्तव्यनिष्ठा व महान झ थीं। यही सभी बातें वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम युवाओं को अपने भीतर विकसित करने की आवश्यकता है, हाँ इस समय परिस्थितियां भिन्न है हमें अपने देश को विदेशी दासता से मुक्त नहीं करना है किन्तु हमारे आत्मविस्मृत समाज  व स्वयं को विदेशी विचारों की दासता से मुक्त होने की आवश्यकता है।
  आज शहीद दिवस के अवसर पर हम सभी युवा अपनी सुख-सुविधा, बुरी आदतों की बलि देकर एक समृद्ध, शिक्षित व सुसंस्कृत राष्ट्र के लिए तैयार हो। ऐसी आशा है।
              

- प्रवीण भादे


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