Friday, March 17, 2017

मोहरा बनती छात्र राजनीति

"राजनीति- एक सामाजिक उत्थान के लिए करने वाला कार्य या फिर सत्ता के रणधीरों का एक अखाड़ा या फिर एक ऐसा नशा है जिसके समक्ष हर नशा फिका सा लगता है." इनमे से किसी भी उद्धेश्य को लेकर राजनीति हो, समाज पर प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ता, पर जहां कम समय में प्रसिद्धि पाने की प्रतिशपर्धा हो, तब वहां से ही राजनीति द्वारा सामाजिक पतन का प्रारंभिक दौर शुरू हो जाता है.

पिछले 1-2 वर्ष से दिल्ली विश्वविधयालय और वहां का जे एन यू  कैम्पस लगभग इस देश के हर प्रमुख समाचार पत्रो का केंद्र बिंदु बना हुआ है, और पिछले दिनों हुई रामजस कॉलेज की घटना इस बात पर मोहर भी लगा देती है।

दो सामाजिक संघठन के छात्र गुटों के बीच में हुए संघर्ष को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की अपेक्षा उसे इस ढंग से उठाया जाता है, जिससे वो देश का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन जाता है. जिसपर इस देश के प्रसिद्ध खिलाड़ियों से लेकर कलाकारों तक, राजनेता से लेकर अभिनेता तक अपनी राय प्रकट करने लगते है. इन सभी लोगों के पक्ष रखने के पहले अगर पत्रकारिता धर्म ने अपना पक्ष रखा होता तो आज शायद ये संवेदनशील माहौल ना बना होता।

युवा देश की नीव होता है, इन्ही के सामर्थ्य पर देश का भविष्य निर्भर करता है, और जिस दिल्ली विश्वविद्यालय ने देश को तमाम क्षेत्रो में नामी गिरामी हस्तिया दी है, आज उसी विश्वविद्यालय के कुछ युवा, उसी शिक्षा के मंदिर से आज़ादी के नारे बुलंद कर रहे है, देश की अखण्डता और संप्रभुता को नष्ट करने का स्वप्न संजो रहे है।  उन छात्रों का ना तो कुछ उद्धेश्य है और ना ही उनका कुछ ध्येय है, वो तो बस कुछ पार्टी के नेताओ द्वारा पथभ्रष्ट हो जाने के कारण आपने भविष्य की व्यर्थ ही आहुति दे रहे है, और वो भी उन पार्टीयो के लिए जिनका आज इस देश में किंच मात्र भी जनाधार नही बचा है.

उनकी दयनीय स्थिति का अंदाजा केवल इस बात से लगाया जा सकता है, की जनता द्वारा उनको लोकतंत्र के मंदिर से मुक्त करवाने के बाद भी, वे अब शिक्षा के मंदिरो से अपनी दूषित विचारधारा के प्रचार प्रसार में अनवरत लगे हुए है।  जिसके परिणाम स्वरूप जिन विश्वविद्यालयों में भारत माता की जय के उदघोष के साथ दिन प्रारम्भ होना था, आज वहां भारत से आज़ादी तक जंग रहेगी जैसे नारे लगाये जा रहे है.
पहली बार जब कुछ युवाओ द्वारा राष्ट्रविरोधी बातें कही गयी थी, अगर उसी समय समस्त पत्रकारिता जगत एक होकर ऐसी दूषित मानसिकता के विचारो का प्रचार प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर नही करता तो शायद वो आंदोलन उसी वक़्त खत्म हो गया होता और फिर आज किसी शहीद की बेटी को बुद्धिभ्रष्ट कर उसे निशाना ना बनाया होता |

 - सुयश त्यागी

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया जी

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  2. भाई साहब शानदार, इसी तरह युवाओं से जुड़ा एक आर्टिकल लिख रहा हूँ ठीक रहे तो बताईएगा ।

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